बढ़ती महंगाई, घटती गुणवत्ता और मिलावटी खाद्य पदार्थ के लिये जिम्मेदार सरकारी तंत्र नींद से कब जागेगी !!!

# Admin | 11 Sep, 2025

बढ़ती महंगाई, घटती गुणवत्ता और मिलावटी खाद्य पदार्थ के लिये जिम्मेदार सरकारी तंत्र नींद से कब जागेगी !!!

🔺️मिशन क्रांति न्यूज़, "विचार मंच"✍🏻

संतोष मिश्रा, बिलासपुर


बिलासपुर निवासी संतोष मिश्रा एक सामान्य नागरिक जिनकी "आवाज" और "सोच" आज के दौर की उपभोक्ता के समस्याओं पर गंभीर चिंता जताते हुए "मिशन क्रांति न्यूज़ विचार मंच" के माध्यम से अपनी राय अपने विचार "विचार मंच" से साझा कर रहे हैं,

श्री मिश्रा का कहना है कि वह जमाना अब बीत चुका है जब किसी भी वस्तु का दाम, वजन और गुणवत्ता पूरी तरह से ईमानदार और संतोषजनक हुआ करता था। आज के समय में, पिछले कई वर्षों से लगातार दामों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, जबकि उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है। इस स्थिति से जनता न केवल आर्थिक रूप से प्रभावित हो रही है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का भी शिकार बन रही है। मिश्रा की यह टिप्पणी न केवल एक व्यक्तिगत शिकायत है, बल्कि देश भर में व्याप्त उपभोक्ता असंतोष की एक बड़ी तस्वीर पेश करती है।

श्री मिश्रा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, "एक जमाना था जब सब कुछ सही मिलता था, लेकिन अब दाम बढ़ रहे हैं, वजन कम हो रहा है, और गुणवत्ता गायब है, लोग फूड पॉइजनिंग के शिकार हो रहे हैं, जेबें ढीली हो रही हैं, और ज्यादा सामान खरीदना पड़ रहा है।" उनकी यह बात देश के उपभोक्ता बाजार की वास्तविकता को उजागर करती है।

🔹️महंगाई से लोग हलाकान

हाल के वर्षों में, भारत में महंगाई की दर ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में खाद्य पदार्थों की कीमतों में औसतन 7-8% की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि कई उत्पादों में 'श्रिंकफ्लेशन' (उत्पाद की मात्रा कम करके कीमत वही रखना) का चलन बढ़ा है। उदाहरण के लिए, चिप्स, बिस्किट और डेयरी उत्पादों जैसे पैकेज्ड फूड में पैकेजिंग का आकार छोटा कर दिया गया है, जिससे उपभोक्ताओं को वही कीमत पर कम सामान मिल रहा है। इसके अलावा, मिलावटी और कृत्रिम सामानों की समस्या ने स्वास्थ्य संकट को जन्म दिया है।

 मिश्रा ने विशेष रूप से जोर दिया कि "कृत्रिम सामानों में पूरी तरह से मिलावट की जा रही है, जिससे लोग बीमार हो रहे हैं, उम्र कम हो रही है, और पुरुषत्व में कमी आ रही है।" यह दावा वैज्ञानिक अध्ययनों से भी मेल खाता है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2024 में देश भर में किए गए छापेमारी में 25% से अधिक खाद्य नमूनों में मिलावट पाई गई, जिसमें दूध में यूरिया, मसालों में रंगीन पदार्थ, और तेल में हानिकारक रसायनों की मौजूदगी शामिल है। ऐसे मिलावटी पदार्थों से फूड पॉइजनिंग के मामले बढ़े हैं – केवल 2025 के पहले छह महीनों में ही, विभिन्न राज्यों से 5,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से कई घातक साबित हुए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक ऐसे मिलावटी उत्पादों का सेवन न केवल पेट संबंधी बीमारियां पैदा करता है, बल्कि हार्मोनल असंतुलन भी लाता है। एक हालिया अध्ययन, जो इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित हुआ, ने संकेत दिया कि मिलावटी खाद्य पदार्थों में मौजूद रसायन जैसे बीपीए और फथेलेट्स पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन स्तर को कम कर सकते हैं, जिससे प्रजनन क्षमता और समग्र स्वास्थ्य प्रभावित होता है। महिलाओं और बच्चों में भी कैंसर, मधुमेह और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ रहा है। मिश्रा की बात को आगे बढ़ाते हुए, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि यह चलन जारी रहा, तो औसत जीवन प्रत्याशा में कमी आ सकती है – वर्तमान में भारत की औसत आयु 70 वर्ष के आसपास है, लेकिन प्रदूषित और मिलावटी भोजन से यह और घट सकती है। नशा संबंधी सामानों की बात करें तो मिश्रा ने कहा, "नशा का सामान हो या खाद्य सामान, दाम बढ़े हैं लेकिन गुणवत्ता और मात्रा कम हुई है।" यह सही है कि तंबाकू, शराब और अन्य नशीले पदार्थों की कीमतों में जीएसटी और करों के कारण वृद्धि हुई है, लेकिन अवैध बाजार में मिलावटी उत्पादों की बाढ़ आ गई है। उदाहरणस्वरूप, नकली शराब के मामलों में 2024-25 में 30% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे सैकड़ों मौतें हुईं। यहां तक कि वैध उत्पादों में भी, मात्रा कम करके लाभ कमाया जा रहा है। मिश्रा की सबसे बड़ी चिंता सरकार और प्रशासन की निष्क्रियता पर है: "सरकार कहां है, पता नहीं; प्रशासन कहां है, पता नहीं? लगता है भगवान भी कहां है, पता नहीं?" यह सवाल लाखों उपभोक्ताओं के मन में है। हालांकि, सरकार ने एफएसएसएआई के माध्यम से 'फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स' जैसे अभियान चलाए हैं, लेकिन कार्यान्वयन में कमी है। कई राज्यों में छापेमारी होती है, लेकिन दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि सख्त कानून और जागरूकता अभियान की जरूरत है।

अंत में, मिश्रा की चिंता दार्शनिक मोड़ लेती है: "क्या से क्या हो गया, कुछ पता नहीं? क्या यही कलयुग का अंतिम चरण है, क्या यही प्रलय की शुरुआत है?" हिंदू शास्त्रों में कलयुग को पाप और अधर्म का युग कहा गया है, जहां नैतिकता और ईमानदारी की कमी होती है। कई धार्मिक विद्वान मानते हैं कि वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण, नैतिक पतन और आर्थिक असमानता कलयुग के अंतिम लक्षण हैं। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह उपभोक्ता अधिकारों की लड़ाई है, जिसके लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी संकट पैदा कर रही है। उपभोक्ता संगठन जैसे कंज्यूमर वॉयस और जागो ग्राहक जागो अभियान चला रहे हैं, लेकिन बदलाव के लिए सरकार, उद्योग और जनता की साझा जिम्मेदारी है। यदि आप भी ऐसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो स्थानीय उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराएं।

क्या यह वाकई प्रलय की शुरुआत है? शायद नहीं, लेकिन अगर सुधार नहीं हुआ, तो स्थिति और बिगड़ सकती है।

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